कलम..

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Thursday, 19 September 2013

आत्मा मैं





युगों ने बदला ब्रह्माण्ड का स्वरूप
सदियों ने तय किया इंसान का रूप 
परन्तु मैं वहीं हूँ जहां कालांतर में थी 
समय का हर क्षण ब्रह्माण्ड की हर वस्तु 
जानना चाहती है आखिर कौन हूँ मैं 
अपना रहस्य खोलने वाली 
एक आत्मा क्यों मौन हूँ मैं 
अपने अस्तित्व के बारे में 
क्या मुझे कुछ कहना है 
या सृष्टि की रचना के सन्दर्भ 
में यूँ ही चुप रहना है 
विशाल अन्तरिक्ष की गहनता 
को नाप है मैंने 
लाखों मीलों का सफ़र 
पलक झपकते किया है मैंने 
समय का पहिया हर क्षण 
एक नया दृश्य सम्मुख प्रस्तुत 
करता रहा 
इस ब्रह्म लोक में काल भी 
मुझसे प्रश्न करता रहा 
एक आवेग एक ओज एक तेज का 
समावेश है मुझमे 
जो हजारों प्रकाश पुंजों के तेज को
ध्वस्त करता रहा 
कितनी ही आकाश गंगाओं
से गुजरी हूँ मैं 
पृथ्वी पर जब मेरा आगमन हुआ 
तनिक पहले उसके आवरण ने मुझे छुआ
सहसा आभास हुआ परमात्मा का अंश
जो मुझमे था कहीं खो गया 
अनायास ही भटकती जा रही थी 
छली जा रही थी हर पल हर क्षण 
हर घडी मुझे जता रही थी 
निष्क्रिय हो किस दिशा में खिची  
चली जा रही थी 
वायु का वेग पीड़ादायक महसूस होता था 
सहसा बज्रपात हुआ 
जैसे मेरे अहम पर कुठाराघात हुआ 
ठोस धरातल की चट्टानों के बीच 
बिखर चुकी थी मैं 
इधर उधर कितनी ही बूंदें छिटक गयी 
कितनी घनघोर पीड़ा उठती थी 
कितना भयावह दृश्य था 
हर बूँद सिमट कर एक आकार ले रही थी 
जो जीवन को विस्तार दे रही थी 
एक जनम दूसरा जनम तीसरा  जाने 
कितने जनम 
इस तरह मृत्यु के लोक में हुआ 
मेरा स्वागतम 
निरर्थक है या है सार्थक ये 
कहना है मुश्किल
उस के द्वारा रची गयी हूँ परमात्मा
है इसका हल 
उस दैवीय शक्ति को बना मंजिल 
मैं देह में आरूढ़ होती हूँ 
हर जीव में विद्यमान हूँ मैं 
कोई रूप आकार नहीं है मेरा 
ये बेहद रहस्यात्मक है घेरा
बस तुम मुझे महसूस करो 
अथाह शक्ति है मुझमें 
तुम मेरा आवाहन करो 
क्षण भर ना डरो
ना विचलित हो तुम में मैं 
हूँ या मैं में तुम 
इस उधेड़बुन में हो जाओ
गुम
यह गूढ़ रहस्य कभी होगा
उजागर 
मैं जल की एक मत्स्य वो है 
विशाल सागर