Friday, 26 July 2013

पगडंडी







घने पेड़ों के बीच बनी पगडंडी उस गावं जाती थी 

पैरों तले दबती उस घास का फिर से उग आना
देवदार की पत्तियों से हवा का टकराना 
वो सायं सायं की आवाज आती थी 

महकते जंगली फूलों की वो खुशबू 
चहकती कोयल की वो कू-कू 
जैसे कोई साज बजाती थी 

पानी के झरनों की कडकती ठंडाई 
गीले पत्थरों पर जमीं वो काई
जीवन का ठहराव  दिखाती थी 

ठंडी धुप की हलकी गरमाहट
हिलती पत्तियों की धीमी सुगबुगाहट 
कोई राज सुनाती थी 

दूर होती डालियों का पास आकर लिपटना 
शोर  करते झिगुर का होले से सिमटना 
जैसे कोई सितार बजती थी  

यहाँ वहां मंडराना रंग बिरंगी तितलियों का 
शाम ढलते लौट आना उड़ते पंछियों का 
घर की याद दिलाती थी 

उठने लगी कहीं दूर धुंध हलकी हलकी 
बरसाने लगी गीली बारिश छलकी छलकी
मिटटी की भीनी खुशबू आती थी 

डाल बदन पर कम्बल हम लपेट चले 
बिखरी हवाओं  में यादें समेट चले 
अब सिर्फ याद सताती थी 

घने पेड़ों के बीच बनी पगडंडी उस गावं जाती थी 

Thursday, 18 July 2013

ये परछाई कैसी है




खामोश निगाहों की ये उदासी कैसी है
बंद मुठ्ठी से रेत सरकने जैसी है
बरबस ही भर आता है मन
जब रोता है कोई दर्पण
ये तन्हाई कैसी है
कोई आहट सुनाई देती है 
कमरे में दिखाई देती है
ये परछाई कैसी है 
बेरंग हुई दीवारों की
दो टूटे हुए किनारों की 
ये जुदाई कैसी है 
मुरझा गयी हर कली
आज चमन में है चली
ये पुरवाई कैसी है 
सजा मुकम्मल न हुई उसकी
वक्त ने दी है जिसकी
ये गवाही कैसी है


Monday, 15 July 2013

जनता रुपी द्रौपदी






वोटर खड़ा कतार में वोट देने को है बेकरार 
मनन चिंतन करता कौन से और किस मंत्री 
के वायदे पर करूं ऐतवार 
सयासी गलियारों में जो गूँज थी वो उठती
आवाजें लगी लुभाने में 
चुनावों के मद्देनजर सारी पार्टियाँ उतरी
अब मैदानों में 
इधर देखो सत्ता में जो बरकरार सरकार है 
उसमें रोज होते घोटालों की बड़ी भरमार है 
उधर भाजपा में हिंदुत्व की होती जय जयकार है 
बाकि धर्मों को अपनाना शायद उनके लिए एक 
उपकार है 
धर्मनिरपेक्षता बनाम साम्प्रदायिकता 
चेहरा बनाम चेहरे की उडी आंधी है 
इधर नरेन्द्र मोदी तो उधर राहुल गाँधी है 
इन नेताओं को लगता है शायद जनता 
गूंगी बहरी और साथ में अंधी है 
बढती महंगाई की मार रोज झेल रहे 
आपदा पीड़ित राज्यों में लोग भूखों मर रहे 
आरोप प्रत्यारोप के बीच इन्हें जरा फ़िक्र नहीं 
बरसाती बारिश के नीचे कितने अनाज के 
बोरे सड़ रहे
कैसे नेता हैं ये देश के कैसा इनका शासन है 
जनता रुपी द्रौपदी का जैसे चीरहरण करता दुशासन है  

Sunday, 7 July 2013

एक टुकड़ा चाँद का ...






पड़ जाये रंग थोडा फीका नीले आसमान का 

हो जाये मंद गति तेज चलती हवाओं की 
थोडा समंदर भी सूख जाये 
एक टुकड़ा चाँद का भी टूट जाये 
जब मेरी जिंदगी मुझ से रूठ जाये 

ये दीवारें बस में न रहेंगी 

तुम से मेरे दर्द की कहानी कहेंगी 
सब्र इनका न टूटने पाए 
कोई प्यार से इनको समझाए 
जब मेरी जिंदगी मुझ से  रूठ जाये 

न रखना मुझ पर कोई एहसान

मिटा देना मेरा नामो निशान 
परछाई को मेरी कोई दफनाये 
कोई यादों को भी मेरी जलाये 
जब मेरी जिंदगी मुझ से रूठ जाये 

बस न हो मुस्कराहटों का रंग फीका 

चाहत के फूलों का न मुरझाये बगीचा 
चंद दिए आस के जगमगायें 
कोई पलकों पर आंसू न लाये 
जब मेरी जिंदगी मुझ से रूठ जाये

Monday, 1 July 2013

बड़ा विचित्र है नारी मन




बड़ा विचित्र है नारी मन
त्रिया चरित्र ये नारी मन 
खुद से खुद को छिपाती
कितने राज बताती 
अपने तन को सजाती  
सब साज सिंगार रचाती
हया से घिर घिर जाती 
जब देखती दर्पण  
प्रियतम से रूठ कर 
मोतियों सी टूट कर 
फर्श पर बिखर गयी जो
अरमान अपने समेटे 
अस्तित्व की चादर में लपेटे 
सम्मुख सर्वस्व किया अर्पण  
ममता की छावं  में
एक छोटे से गावं में 
चांदनी के पालने में  
लाडले को सुलाती 
परियों की कहानियां 
मीठी लोरियां सुनाती 
नींद को देती आमंत्रण  
खनकते हैं हाथ जिन चूड़ियों से 
तलवारें पकड़ना भी जान गए 
एक फूल से वो अंगार बनी  
लोहा सब उसका मान गए
न रखती कोई भ्रम  
दर्शाती अपना पराक्रम 
एक भोली सी सूरत 
बनी त्याग की मूरत
समझती सबकी जरूरत 
अपने सपनों का घोंटती गला 
इच्छाओं का करती दमन 
बहती अविरल धारा सी 
निर्मल गंगा सी है पावन 
मन उसका छोटा सा 
ओस की बूँद जितना 
समाई है जिसमें सृष्टि 
उसमें ओज है इतना 
अदभुत है उसका रूप 
दुर्लभ शक्तियों का है संगम 
बड़ा विचित्र है नारी मन 

दो लिख रही हूं

तुम जानते हो  दोधारी तलवार पर चलना क्या होता है शायद नहीं जानते  मेरे पास बेबुनियादी बातों का ढेर नहीं है  बल्कि ह...