Tuesday, 11 June 2013

बेहद शर्मिंदा हूँ ..





कुछ तेरा सामान अगर छूट जाए ,
तेरा छूटा हुआ कुछ मुझे मिल जाए ,
कही तुझे एतराज तो न होगा ,
तेरा मन नहीं था तो तूने,
थाली में रखी रोटी को छोड़ा ,
नहीं पहनना था तो तूने,
अपने  कुर्ते का बटन  तोडा,
कितना खुशकिस्मत है ,
तेरी मर्जी में ही उस की मर्जी है,
मेरी तो तेरे से इतनी सी अर्जी है ,
तेरा कुछ टूटे तो न बर्बाद करना ,
हाथ से कुछ छूटे तो मुझे याद करना ,
किस्मत क्या है मैं नहीं जानता हूँ,
जिस दाने से पेट भरे उस को ईश्वर मानता हूँ ,
मेरा हिस्सा संभाल कर रखना ,
जाने आगे क्या क्या है देखना ,
में इस बात पर बेहद शर्मिंदा हूँ,
की तेरे फेंके हुए जूठन पर जिन्दा हूँ  .....


12 comments:

  1. वाह चित्र को बहुत ही सुन्दरता से परिभाषित किया है आपने साथ ही साथ सत्य से रूबरू भी करवाया है सुन्दर रचना हेतु हार्दिक बधाई स्वीकारें.

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  2. आपकी यह रचना कल शनिवार (15 -06-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  3. दर्दनाक हकीकत को रचना के माध्यम से अच्छे शब्द दिए हैं !!

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  4. बेहद संवेदनशील रचना...

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  5. बचपन भी कितना मजबूर है !

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  6. samvedansheel, dard se bhari hui.. rachna...
    dil ko chhooo gayee...

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  7. "तेरी मर्जी में ही उस की मर्जी है,मेरी तो तेरे से इतनी सी अर्जी है"----These lines are really appealing. I pray to god to bless such underprivileged children. Thanks once again for writing such an appealing poem and thanks for providing your valuable comments on Hindi Sahitya Margdarshan.

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  8. iss chhit ke chitran ke lia apko salam

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