Friday, 28 June 2013

... तो चलो मेरे साथ









अगर चल सकते हो तो चलो मेरे साथ 
इन हवाओं से आगे इस जहाँ से आगे 
आकाश की चादर को उस कोने से उतार कर 
तुम्हारे क़दमों के नीचे डाल दिया है 
सूरज की तपती गर्मी न सताए इसलिए 
कुछ देर को कोठरी में डाल दिया है
चाँद तारे बिछ गए हैं राहों में
सारे नज़ारे सिमट गए हें बाँहों में
ये सफ़र बेहद खूबसूरत होगा
उस मंजिल की जरूरत होगा 
अधखुली आँखों के आगे जो 
हलकी रौशनी टिमटिमा रही है 
आते जाते कितने ही असंख्य 
दीयों को एक साथ जला रही है 
आगे चलकर देखो चमन के फूलों 
ने अपनी भीनी महक से फिजाओं 
को बहका  कर होश जो उडाये हैं 
इन सुंदर तितलियों के मखमली 
पंखों को छूकर कुछ रंग
मेरी भी हथेली में आये हैं 
इन से अहसासों का रंग
और गहरा हो रहा है
मन में उठते विचित्र भावों पर
हल्का सा पहरा हो रहा है 
तुम देखते हो बादलों के मध्य 
कितने सितार बज रहे हैं 
जहाँ तक नजर जाती है 
ये सारे मनोरम दृश्य सज रहे हैं 
तुम अपना हाथ आगे बढाओ 
इनका हल्का सा स्पर्श पाओ
इन सब के साथ मिलकर
एक नया जहाँ बसाओ
इस छोर से उस अर्श तक
 सब तुम्हारे हैं 
ये बादल झीलें महकती कलियाँ 
चाहे चाँद तारे हैं 
बस अब मुझे वापिस जाना होगा 
उस जगह जहाँ राह न मंजिल 
का ठिकाना होगा 
ये सब कुछ भी न होगा अब 
कंटीली झाड़ियों और पथरीले
रास्तों का संगम होगा बस 
पैरों में फफोले पड़ेंगे फिर भी 
आग का दरिया पार करना होगा 
मुझे ये सफ़र अकेले तय करना होगा
फिर आऊंगी तुम्हें इस मोड़ से आगे ले जाने
फिर एक नयी सुबह एक नया सपना 
एक और खूबसूरत दुनिया दिखाने

Wednesday, 26 June 2013

......तुम कहाँ थे शिव








तेरे वजूद पर उठने लगा प्रश्न चिन्ह 
तुम कहाँ थे प्रभु ये सात दिन 
दूर देश से दौड़े चले आये 
घरों से निकला रेला
तेरे धाम पहुंचे भक्तों का लगा मेला
उस दिन जब मन में श्रद्धा थी 
मन्नतों का था सैलाब भरा 
तब प्रलय ने तेरे द्वार आ
विकराल रूप धरा
 ......तुम कहाँ थे महादेव
तुम्हारी जटाओं से कैसी निकली अब के ये गंगा 
साथ हो ली मंदाकनी और अलखनंदा 
मंदिर को तेरे शमशान बनाती
समक्ष तेरे मौत का नाच हुआ नंगा 
.....तुम कहाँ चले गए थे भोलेनाथ
एक पिता ने दुःख लाख जताया 
फिर दुःख ने भी उसको लाख समझाया
अपने बेटे को मृत पा कर तीसरे
 माले पर रजाई के बीच सुलाया 
.....तुम क्यों नहीं आये कैलाशपति
देख कैसी कैसी कहानियां 
कह रही तेरी माटी
अपने पति का शव गोद में ले 
तेरे दर पर पांच रातें काटी
कैसे रहे होंगे उसके हालात
खाक हुए सारे जज्बात 
तुम  गहन निद्रा में सोये  
तब भी न हुआ तुम्हारा प्रभात 
.....कहाँ रह गए थे तुम महाकाल
 चंद रोज में ये क्या हो गया 
भरा पूरा परिवार था वो अकेला रह गया
क्या वृद्ध क्या बच्चे हर तरफ त्राहि त्राहि हुई 
देख तेरी नगरी कैसी तबाही हुई
तुम किसी क्षण भी आते तो
 दुःख के साए यूँ न मंडराते 
.....तुम कहाँ चले गए थे शंकर
ये कैसी विडंवना है 
एक दुःख में तू ही जीने का सहारा है 
तुझे छोड़ भला कौन किनारा है 
देता भी है  छीन लेता है जिंदगी  
तुझ से ही जिंदगी उधार मांगते है 
चंद और साँसें दे दे तेरा उपकार मानते हैं 
मगर इतनी प्रार्थना पर भी तुम नहीं आये 
.......ऐसा क्यों रूद्र
तुम तो न आये पर कोई और आया 
जिसके सीने पर था तिरंगा लहराया
वो वतन की शान है हमारा सम्मान हैं 
अपनी मिटटी की खातिर मर मिटे 
जिगर में रखता इतनी जान है 
जिसने बीच भंवर में डूबती 
जीवन नैया को पार लगाया 
मेरे मन ने तेरे अस्तित्व 
पर सवाल उठाया 
एक नजर तुझे ढूंढती 
आकाश तक जा पहुंची पर 
एक नजर टिकी थी उस पर 
तेरी आस टूट चुकी थी
देर हो चुकी थी बहुत अब 
देखो तुम से सब कितना डरते हैं
इतना सब होने पर तुझे दोष न देकर 
खुद पर दोषारोपण करते हैं 
तुम समझो इस जीवन को खेल ही सही 
पर बात दिल में एक ही रही 
कभी तुम भी इस मृत्यु लोक में जन्म लो 
किसी पिता के दर्द को समझो 
कैसे तुम्हारा तन थर्रायेगा 
मन रोता बिलखता रह जाएगा 
अथाह दर्द को समेटे जब
तुम भी किसी को पुकारोगे 
तो कोई नहीं आएगा 
.......तुम कहाँ थे त्रिदेव

Friday, 21 June 2013

लोग लिखते हैं .....







लोग लिखते हैं कलम उठाते हैं 
रंजोगम की एक दुनिया बनाते हैं 
खुद रौशनी की शम्मा जला 
उसके तले पिघलते जाते हैं
रूह को सकूं मिल जाये शायद 
बस इतनी सी बात होती हैं 
जितना दर्द बढ़ता जाता है 
उतनी ही जवां रात होती है 
कुछ शायराना तबियत है
कहीं शायराना अंदाज है 
सुर भी बहके बहके हैं
बहका हुआ हर साज है 
गम में डूबे वो लव्ज 
कुछ अफ़साने बयाँ कर जाते हैं 
आगे चलते चलते 
खुद को कहीं पीछे छोड़ आते हैं  
बेबाकी कि हदें तोड़ कर  
कुछ ऐसे भी शौक पालते हैं 
पन्नों पर लिखते लिखते 
खुद को उधेड़ डालते हैं 

Sunday, 16 June 2013

यूँ आया अबके सावन.....



   


ये चंचल मन 
मयूर गया बन 
कहीं दूर गगन 
शोर करें घन 
प्यासा है उपवन 
बूंदें बरसी छमछम
गए उसमें सब रम
धरती जो हुई नम
भिन्नी खुशबू गयी बन 
थी बढ़ती जो तपन
हलकी हुई वो जलन
चली जो मंद पवन 
गीला हुआ सारा चमन
भीगा मेरा भी तन
 सांसें हुई मगन
 बारिश का हुआ आगमन
करूं कोई गम
नहीं था वो मौसम
नंगे पावं दौड़ते हम
उड़ चले पंछी बन
सराबोर है कण कण 
झूमती पत्तियां सन सन 
कहीं जाये न थम
हो जाये न गुम
कारे बदरा लगे मनभावन
हुए इतने पावन
एक त्यौहार बन 
यूँ आया अबके सावन 


Tuesday, 11 June 2013

बेहद शर्मिंदा हूँ ..





कुछ तेरा सामान अगर छूट जाए ,
तेरा छूटा हुआ कुछ मुझे मिल जाए ,
कही तुझे एतराज तो न होगा ,
तेरा मन नहीं था तो तूने,
थाली में रखी रोटी को छोड़ा ,
नहीं पहनना था तो तूने,
अपने  कुर्ते का बटन  तोडा,
कितना खुशकिस्मत है ,
तेरी मर्जी में ही उस की मर्जी है,
मेरी तो तेरे से इतनी सी अर्जी है ,
तेरा कुछ टूटे तो न बर्बाद करना ,
हाथ से कुछ छूटे तो मुझे याद करना ,
किस्मत क्या है मैं नहीं जानता हूँ,
जिस दाने से पेट भरे उस को ईश्वर मानता हूँ ,
मेरा हिस्सा संभाल कर रखना ,
जाने आगे क्या क्या है देखना ,
में इस बात पर बेहद शर्मिंदा हूँ,
की तेरे फेंके हुए जूठन पर जिन्दा हूँ  .....


Monday, 10 June 2013

बोझिल हुई वो बूढी आँखें


                                                                   

कोई जनता है कोई आने को है,
अब ये मौसम ये बहार जाने को है|
पतियों की सुर्ख लाली करती है इशारा,
पानी की लहरें भी करती है किनारा,
अब वो समंदर सूख जाने को है|
चढ़ते सूरज की तपती जवानी,
कहती है दिन भर की कहानी,
अब वो शाम ढलने को है|
वक्त कहीं थम कर रह गया,
हवा का झोंका कानों में कुछ कह गया,
अब वो बादल छाने को है|
दूर होते दरख़्त के वो साए,
जिन रास्तो पर हमें छोड़ आये,
अब वो सफ़र छूटने को है|
हाथ की लकीरों का वो दरकना,
जिंदगी का धीरे से सरकना,
अब वो सांस टूटने को है|
धुंधली हुई जिनकी रौशनी,
बोझिल हुई वो  बूढी आँखें,
अब गहरी नींद सोने को है ..

Saturday, 8 June 2013

इन आँखों को भी भीग जाने दे


महरूम कर गम से हमें ,
बस इतनी सी शिकायत है, 
जैसे हवा में घुलती है खुशबू, 
तमाम उमर यूँ ही गुजर जाने दे |
तेरे प्यार का मरहम ,
झेल पाएगें हम,
बरसता है सावन जैसे ,
इन आँखों को भी भीग जाने दे |
आखिरी मोड़ पर जो खड़ी हुई ,
जिंदगी इक सवाल ही रही, 
लो थम  गयी है रात ,
अब इन साँसों को भी थम जाने दे |
तेरे दर से और कहीं ,
क्या ले जाएँ हम,
अरमानों का था जो आइना,
उसको भी टूट जाने दे |
कदम खुदबखुद रुक गए, 
वो राह  कहीं खो गयी ,
था सफ़र जिसका बाकी ,
उस मंजिल को अब छूट जाने दे |

Friday, 7 June 2013

"कृपया कूड़ा मुझे दें "


उसका रुदन जो किलकारी बन कर गूंजा ,
सारा गाँव देखने पंहुचा ,
वो है एक नन्ही कली,
उसकी आँखों में मासूमियत पली ,
छोड़ दूसरे जहाँ को इस जहाँ में आई  है,
संग अपने परियों की कहानियां लाई है,
वो लगती कितनी प्यारी है ,
वो तो एक राजकुमारी है ,
ये एहसास उसे हुआ ही था,
अभी माँ के स्पर्श ने छुआ ही था,
ये  देख बाप को कोई हर्ष हुआ न था,
त्योरियां सबकी  चढ़ने लगी ,
कानों में फुसफुसाहट बढ़ने लगी,
जो उसके अपने थे हुए वो बेगाने,
जब सबने कसे ताने
कहाँ से आ गयी मनहूस न जाने ,
अब बाप तो जीवन भर इसका रोएगा ,
बेटी तो बोझ है कैसे ढोएगा,
दाई  हाय दईया  कहती निकल गयी ,
खुशियाँ सबकी मातम में बदल गयी ,
कुछ वोह बूझ रहा था ,
रास्ता कोई सूझ रहा था,
आधी रात को कम्बल उसने लपेटा,
बेदर्द हाथों से बोझ को समेटा,
कदमों की टाप में अभी भी वो सो रही थी,
देख उसको सूनी सड़क भी रो रही थी ,
क्या सोच वो उसके घर आयी थी ,
जहाँ बाप की बाहें उसके लिए परायी थी ,
कुछ जरा दूर जाकर असमंजस में  वो रुका,
"कृपया कूड़ा मुझे दें "उस पर था लिखा ,
कुछ चूहे जो वहां खटर पटर कर रहे थे,
सन्न उस पापी का पाप देख सोच  रहे थे,
हे ईश्वर तू ही देख किस कदर इंसान हो गया ,
जिंदगी को कचरे पर फेंका वो इतना हैवान  हो गया |

दो लिख रही हूं

तुम जानते हो  दोधारी तलवार पर चलना क्या होता है शायद नहीं जानते  मेरे पास बेबुनियादी बातों का ढेर नहीं है  बल्कि ह...