Saturday, 19 August 2017

दो लिख रही हूं







तुम जानते हो 
दोधारी तलवार पर चलना क्या होता है

शायद नहीं जानते 
मेरे पास बेबुनियादी बातों का ढेर नहीं है 
बल्कि हथकरघे के पंजों में फसे कितने ही सटीक धागे हैं 
जो आगे पीछे ऊपर नीचे होने पर नहीं उलझते 
जैसे पहाड़ की ऊँची चोटी की तीखी नोकदार ढलान पर घास चरती भेड़ बकरियां नहीं गिरती 

रिवाज के मुताबिक जिस्म और रूह का अलग अलग हो जाना  
रात ढलते ही समझौता करना 
तकिये का गीला होना 
एक उम्मीद का धीरे से खिसकना 
रात के अंतिम पहर में हौले से उठना 

अधूरी कंघी कर के वे नुमाइश के लिए नहीं निकलती 
जितना हो सकता है 
जंगल में जाकर लकड़ियां बटोरती हैं आनन फानन में 
इस पशोपेश में भी 
कोई जिंदगी का सिरा ही हाथ लग जाये 
अपनी मजबूती जांचने के लिए कमजोर टहनियों पर कुल्हाड़ी भी चला लेती हैं
दराती से घास काटते वक्त कितने जख्म भर जाते होंगे और रिस जाते होंगे 
धान की बुआई में झुकती डालियां किसी केल्शियम की मोहताज नहीं होती
बीसियों बड़ी बातें होती हैं 

दो लिख रही हूं  
वजूद से हट कर औरत होना 
वादे के मुताबिक जिन्दा होना 









Friday, 28 October 2016

एक दिन जिंदगी...










दिन जलता है 
और रात आहें भरती है 

मालूम भी हो कि जिंदगी किस वक्त जीनी है 

थोड़ा थोड़ा ही सही 
आंगन का दरख़्त हर रोज झड़ता है 
आसमान को मुट्ठियों में लपेटे हुए 
टहनियों से अनाम चेहरे उतर आते हैं 
धूल की सतह तक  

आखिरी सफर एक उम्मीद तक 
जो रहता ही नहीं 
रह जाती है खलिश उसकी 
वक्त से पंख लेकर बैठे रहते हैं कई परिंदे 
वो उड़ते क्यों नहीं 

मेरा ख्याल है 
हर बार का उड़ना उड़ना नहीं होता 
न ही हर रोज का जीना जीना 
ये मुकम्मल सौदागरी है अंधेरे की  

जी रही है रौशनी हर लिहाज से मरने के लिए  

Tuesday, 27 September 2016

राम की मैं सीता थी






                               

तुम मुझे देवी का दर्जा ना दो  
तुम मेरी महिमा का बखान ना करो

ना ही मेरी ममता करुणा वात्सल्य जैसी भावनाओं का ढोंग रचाओ 
देह का सौंदर्य और प्रेम का गुणगान किसी कविता में ना करो 
मेरे त्याग और बलिदान को जग से ना कहो
मुझे गृहलक्ष्मी और अन्नपूर्णा जैसे देवीय नाम ना दो 

मैं जानती हूँ सब 
ये सब तुम क्यों कहते हो 
कितना छल करोगे मुझसे 
मैं निष्प्राण नहीं काठ की मूर्ति जैसी
मैं सांस लेती हूं 
दर्द से विहल होती हूं 

देवी का दर्जा देकर और क्या क्या करवाओगे 
देवी होने के वाबजूद मैं अपने अस्तित्व की तलाश में हूं
आखिर क्यों ?
मैं मूढ़मति इतना भी ना जान सकी  

राम की मैं सीता थी 
थी महाभारत में मैं पांच पतियों वाली 
मानव क्या 
देवता क्या   
स्वयं ईश्वर के हाथों जो छली गयी 
वो थी मैं

एक आग्रह 
एक विनती है तुमसे मेरी 
तुम मुझे सिर्फ एक इंसान ही रहने दो 



Thursday, 22 September 2016

हमें नहीं आता हाथ पकड़ना






                            




हमें नहीं आता हाथ पकड़ना 
साथ बैठना 
रास्ता दिखाना 
किसी के आंसू पौंछना

जब हो रही हो कठोर दर कठोर जिंदगी 
पार कर रहे पहाड़ जैसे अनुभव 
पराधीनता से लैस बर्चस्व 
दरारों के जैसे प्रयास 

सूख रहें हो जलप्रपात 
अपनी ही मिटटी अपने हाथों से छूटती जा रही हो 
और छूट रहे हों शरीर से प्राण 

तब अटल समाधान हो सकता था 
नवनिर्मित किया जा सकता था विश्वास 
दे सकते थे अपनापन 
दूर हो सकता था अंधकार  
लौट सकती थी सुबह 

और उजली हो सकती थी चांदनी 

मगर किताबी बातों को परे रख 
क्षण भर को आये स्वार्थ को दूर कर 
हम नहीं जुटा सके हौसला 
ना कर सके सामने से मदद 
न जोड़ सके उसकी हड्डियां 
न ही फूंक सके उसमें प्राण 

हमें आता है 
पीठ पीछे ढोंग करना 
मगरमच्छ के आंसू बहाना
दया दिखाना 
ग्लानि भाव लिए 
अपराध बोध से ग्रस्त होना  

हमें नहीं आता 
कठिनतम समय में किसी से प्रेम करना 


Monday, 31 August 2015

नागफणी और मैं





                                    





समय की रेत में तपती 
नागफणी और मैं 
क्या अभयदान के जैसा जीवनदान होगा 
हम दोनों का

पीड़ा की अनेक गाथाएं रची जा रही हैं  
मेघों की पहली बूंद से फूटती तुम  
दर्द की कविता सी फलती मैं

कांटों का नुकीलापन
अंतर्द्वंद्वों का संताप  
बेदनाओं की सीमा से परे

कठोर दर कठोर हुई आदतन 

Friday, 14 August 2015

समीक्षा .."आधी रात के रंग" Midnight colors..





साहित्य का हर एक क्षण अनमोल है , कवि विजेंद्र जी से मेरी मुलाकात फेसबुक पर ही हुई उनको हाल फिलहाल में कई साहित्यिक पत्रिकाओं में पढ़ा सो उनको पहचानने में देर नहीं लगी | वे एक वरिष्ठ परिष्ठित कवि हैं ये बात भला कौन नहीं जानता मगर यहां आज बात रंगों की है कैनवास की है , आह ! ..कैनवास पर बिखरे रंग मेरी धड़कन हैं मुझे पता है, लेकिन ये चित्र मुझे सम्मोहित करने में जुटे थे ..उनकी भाषा परिभाषा एक जादूगरी.. आखिर ये कौन चित्रकार है ?









एक व्यापक समारोह सा प्रतीत होता है,जितनी बार भी पन्ने पलटना उतनी ही बार वायलन की एक मीठी धुन चलती है.. कैनवास पर कभी रंग तो कभी शब्द अपना अस्तित्व बिखेरते हैं, मूक भाषा में जीवन गिरहें खोलते हुए  कभी अनछुए कभी सतही और कभी गहरे में जा धसते | सृष्टि के सम्पूर्ण सौंदर्य की व्याख्या करना आनंददायी तो है ही..कोई निजता में मन की अंतरंग सतहों के भीतर से अभिव्यक्ति का मूक रूप निकाल कर रंगों शब्दों का अद्भुत संसार रच सकता है ये समझना थोड़ा जटिल विषय है और विस्मित करने वाला भी
मोहपाश में जकड़ने वाली इन खूबसूरत कविताओं और सम्मोहित कर देने वाले चित्रों का अनूठा संकलन है "आधी रात के रंग "(midnight color) जो प्रतिष्ठित कवि आदरणीय विजेंद्र जी की अनमोल कृति है | कवि विजेंद्र लम्बे समय से कविता और चित्रकला को समर्पित हैं |
          


एक रचनाकार का अपना एक साम्राज्य होता है समुद्र की गहराई से लेकर आकाश की ऊंचाई तक ,उसमें उसकी कितनी पैठ है ये रचनाकर्म को देखकर अनुभव किया जा सकता है |   
मेरे अनुसार क्रमबद्ध ही इन कविताओं का अपना सौंदर्य और वैभव जान पड़ता है -

मेरे लिए कविता रचने का कोई खास क्षण नहींमैं कोई गौरैया नहीं / जो सूर्योदय और सूर्यास्त परघौंसलें के लिएचहचहाना शुरू कर दे  
..लिखने की दृढ़ता के साथ साथ नितांत निजी भावों को कवि ने कविता में मुखर किया है
 जो कुछ कविता में छूटता हैमैंने चाहा की उसेरंग बुनावट ,रेखाओं और दृश्य बिम्बों में / रच सकूँ      
ये एक ही पंक्ति कवि के चित्रकला प्रेम को बखूबी दर्शाती है
कहीं ना कहीं कविता और चित्रों को एक साथ पढ़ते हुए मैं विचलित भी हुई, लेटिन के महान कवि होरेस का एक कथन याद आया "चित्र एक मूक कविता है" |

"चित्र मेरे लिए सदा कविता के पूरक रहे हैं ,कवि करम के लम्बे दौर में चित्रकला मुझसे कभी दूर नहीं रही ..कविता मेरा जीवन है और चित्रकर्म उस जीवन जीने की रंगमयी प्रक्रिया - कवि विजेंद्र"



पढ़ते हुए मैंने भी जाना कि रंगों की एक समूची कविता शब्द बनकर कैनवास पर अपने आप ही बिखर जाती है |
रंगों की स्वायत्ता में भी कविता है/ ..कैनवास पर बिखर .. रंगों दृश्य क्षितिज रचकर /मुझे कविता की ऐसी संगति दो /जहां मैं अपनी आत्मा काआरोह अवरोह सुन सकूँ |

कवि का चित्रकला पक्ष और कवि पक्ष अपने ही मापदंडों पर भारी पड़ता है 


इस रोयेंदार क्षण/ छायाएं सघन और खुरदरी हैंनीरवता की क्षुब्द लहरेंखाली दीवारों से टकराती हैं जबकि मैं महसूस करता हूंसुर्ख रंग की चीखें/ आह्लाद भूरे रंग का/ काले रंग का भूर्भंगगुलाबी रंग का हर्ष
शीर्षक कविता "आधी रात के रंग" अद्वितीय रंगों से भरी एक सजीव कविता है जागती हुई, बोलती हुई जो घुप अंधेरों में भी जीवन के प्रति मद्धम पड़ रही संवेदनाओं को और गहरा करती है |
जहां मिथक का सच कविता एक परतों में विभाजित सच्चाई को सतह तक लाने का सफल प्रयास है वहीं
नागफणी अथाह दर्द से द्रवित ..


मेरे कांटों के कारण /मुझे कोई प्यार नहीं करता.. मेरी करमरेख/ प्रकृति ने मुझे /कैसा जड़ बना दिया है /जबकि मैं पत्थरीले उजाड़ मेंजीवंत पौधा हूं |

बसंत के चित्र और कविता में हरापन स्याहपन में बदलता नजर आया है एक साथ में प्रश्न भी उभरा है बसंत को लेकर जो परिभाषाएं गाढ़ी जाती हैं उससे अलग कुछ और हो सकता है ..क्या हरा होना ही न्याय है
"अंकुरण" चित्र और कविता दोनों वर्तमान को सुनहरे भविष्य के साथ जोड़ते हुए और "क्रोंच मिथुन" मनुष्य प्रेम के अनोखे भाव को प्रदर्शित करती हुए | 

इस संकलन को पढ़ना मेरे लिए बड़ा विचित्र अनुभव है ..एक तरफ चित्र है जो सहज और मूक कविता है वही दूसरी और रंग में डूबे अनेक सजीव आकृतियों को उकेरते शब्द |

गायक ,चट्टानों में लहरें ,प्रतीक्षा कविताएं अपने आप में बेहतरीन चित्र भी संजोये है और शब्द भी | हर चित्र अपने आप में एक सूक्षम अर्थ व्यक्त करता है .. 
मैं साक्षी हूं इस बात की ..कवि का प्रेम और रुझान कविता और चित्रकला के प्रति ही नहीं.. जीवन की अनन्य खूबसूरती के प्रति भी है


ये  कहना सहज होगा कि कला की पराकाष्ठा का अंत नहीं ना ही कोई सीमा होती है 
   
आदरणीय कवि विजेंद्र जी को असीम शुभकामनायें |
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चित्र और कविता की पंक्तियां काव्यसंग्रह "आधी रात के रंग" midnight color  से ली गयी हैं  
  

Wednesday, 12 August 2015

सयुंक्त काव्य संकलन " सारांश समय का " से मेरी कविताएं...






"डाल से गिरा पतझड़"  


तुम आओ एक बार 

दे जाओ मुझे
मुट्ठी भर आकाश   
अदृश्य स्वपन 
प्रेम चिन्ह  
अमर साहित्य 
नरगिसी फूल

ताकि देख सकूं एक उजाले  
को बढ़ते अपनी ओर
देख सकूं भविष्य की धरा पर 
पहले बसंत को 
गूँथ सकूं एक साथ कई प्रेम लताएं  
ताकि रच सकूं कुंठित मन की धरातल पर 
कालजयी रचनाएँ जो अमिट होंगी
शताब्दियों का सूर्य भी इसकी चमक 
को फीका नहीं कर पायेगा 
बिखेर सकूं अपने निर्जन वन में सुगंध
जो मनभावन होगी     

तब तुम भी जान सकोगे

हवा के हलके स्पर्श को 
चिरागों की उदासी को
सागर की गहराई को  
बारिश में बनते इन्द्रधनुष को 
एक व्यथित रात को 

हम जब भी देखेगें  
देखेंगे डाल से गिरा पतझड़  
हाथों की लकीरों में 
कुछ पुराने जख्म  
एक सिली हुई सुबह में 
सिरहाने रखे स्वपन भी 
सिल हुए होंगे 





"जाने तुम क्या खोजते हो"



जाने तुम क्या खोजते हो 
अथाह समंदर की गहराइयों
से भी गहरे
कितनी तहों में छुपे हैं वो राज 
जिनके नीचे मैं दब रही हूँ 
मुमकिन है कि तुम्हें पा सकूं 
फिर भी घेरती हैं मुझे कितनी बातें 
स्याह घनेरी ये अँधेरी रातें 
तुम कदम बढ़ाओ परवाह 
नहीं मुझे 
मेरी तरफ आओ कोई चाह
नहीं मुझे 
बस इतना जानती हूँ 
दिल का कहा मानती हूँ 
हर क्षण तुम्हें मेरे और करीब लाता है 
और करीब बेहद करीब 
इतना कि तुम्हारी तेज धड़कनों
को महसूस करती हूँ 
फिर भी एक हाथ बढ़ाने में 
देखो मैं कितना डरती हूँ 
तनिक संदेह सा प्रतीत होता है 
मुझे अपने ही प्रेम पर 
तुम्हें पा लिया तो ऐसा हो 
मैं भी खोजती रह जाऊं तुम्हें 
इस समंदर की गहराइयों में 
जिसमें तुम भी कुछ खोजते हो 




"नीला समंदर"


लो समा गयी पन्नों में दास्तां अपनी
एक इशारे पर दूर तक चल कर गयी 
कहानियां अपनी 
एक बुलबुला था जो हवा में हुआ फितूर 
एक रंग था जज्वा था था एक गुरूर 
पर्दाफाश होगा हर राज का पर होगा जरूर 
गहरे जख्मों पर अब हमें नमक है मंजूर 
बेदखल हुए हम हर राह से जो जिंदगी 
तक जाती थी 
और जिंदगी थी जो मुड़ मुड़ कर मौत 
के साये तले जीने चली आती थी 
अभी आसमान की दहलीज पर पावं 
रखा ही था
कि जमीं ने किनारा कर लिया 
आँख मिचौली खेलते सतरंगी सपनों
की जगह
आँखों को अश्कों ने भर लिया
दूर निकल आये इस तरह की लौटना 
बाकि नहीं रह गया 
वो नीला समंदर ही था जो रेत के
उस महल को संग लिए बह गया




"जिंदगी का दरख़्त"


कितनी गिरहें खोली हमने 
अधजगे कभी पलकें मूंद कर
जिंदगी का कोई सिर हाथ  
आया 
हौसले पस्त हुए मन के 
सिल गए होंठ वक्त के 
लफ्जों को भी हमने खामोश  
पाया 
रात के पहलु में ढलती सांझ को
देखा एक मायूस सी मुस्कराहट 
लिए 
हम भी बैठे थे चिरागों को 
हाथों में ले लौ में कंपकंपाहट 
लिए
सुलगते थे सितारे आसमां में 
चांदनी भी थी जल रही 
हैरां हैरां ख्वाब थे सारे 
अधूरी ख्वाहिशें थी पल रही
ख़ामोशी के इस मौहौल में 
बेरंग थे सारे जज्बात 
कुछ तहें खुल रही थी 
सिलवटों से भरे थे लिबास 
जिंदगी के इस दरख़्त पर
पत्ता मौसम सब सूना 
अपने ही साये तले ये सूनापन 
बढ़ता जाता कई गुना  




"अहसासों से भरे मोती" 


तुम उस तरफ हो  
और मैं इस तरफ हूं  

बीच में बिखरे पड़े हैं एहसासों से
भरे शब्दों के मोती 
बड़े प्यार से जब मैंने इन्हें छुआ  
तो सहसा लगा 
तुम्हारा स्पर्श प्राप्त कर लिया 

सिहर गयी हूँ मैं ऊपर से नीचे तक 
धीरे से कानों के पास जो ले गयी 
लगा तुमने हौले से कुछ कहा
सुचकुचाते आंखों से जो लगाया

महसूस ये हुआ कि तुम्हें अभी अभी देखा 
इन्हीं मोतियों को बड़े प्रेम से 
अपने अधरों से चूमते हुए 

एक पल में पूरी देह रोमांचित हो उठी है 












     











दो लिख रही हूं

तुम जानते हो  दोधारी तलवार पर चलना क्या होता है शायद नहीं जानते  मेरे पास बेबुनियादी बातों का ढेर नहीं है  बल्कि ह...